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Showing posts from March, 2018

जब तुलशीदास के सामने प्रकट हुए हनुमान, पढ़े पौराणिक कथा!!!

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जब तुलसीदास के सामने प्रकट हुए हनुमान, पढ़ें पौराणिक कथा श्रीरामचरित मानस लिखने के दौरान तुलसीदासजी ने लिखा- सिय राम मय सब जग जानी; करहु प्रणाम जोरी जुग पानी! अर्थात 'सब में राम हैं और हमें उनको हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहिए।' यह लिखने के उपरांत तुलसीदासजी जब अपने गांव की तरफ जा रहे थे तो किसी बच्चे ने आवाज दी- 'महात्माजी, उधर से मत जाओ। बैल गुस्से में है और आपने लाल वस्त्र भी पहन रखा है।' तुलसीदासजी ने विचार किया कि हूं, कल का बच्चा हमें उपदेश दे रहा है। अभी तो लिखा था कि सब में राम हैं। मैं उस बैल को प्रणाम करूंगा और चला जाऊंगा। पर जैसे ही वे आगे बढ़े, बैल ने उन्हें मारा और वे गिर पड़े। किसी तरह से वे वापस वहां जा पहुंचे, जहां श्रीरामचरित मानस लिख रहे थे। सीधे चौपाई पकड़ी और जैसे ही उसे फाड़ने जा रहे थे कि श्री हनुमानजी ने प्रकट होकर कहा- तुलसीदासजी, ये क्या कर रहे हो? तुलसीदासजी ने क्रोधपूर्वक कहा, यह चौपाई गलत है और उन्होंने सारा वृत्तांत कह सुनाया।  हनुमानजी ने मुस्कराकर कहा- चौपाई तो एकदम सही है। आपने बैल में तो भगवान को देखा, पर बच्चे में क्यों नहीं? आखिर

श्री नृसिंह स्तवः गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय

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श्री नृसिंह स्तवः गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय 〰〰⚛⚛⚛〰〰⚛⚛⚛〰〰⚛⚛⚛〰〰 प्रहलाद ह्रदयाहलादं भक्ता विधाविदारण।  शरदिन्दु रुचि बन्दे पारिन्द् बदनं हरि ॥१॥ नमस्ते नृसिंहाय प्रहलादाहलाद-दायिने।  हिरन्यकशिपोर्ब‍क्षः शिलाटंक नखालये ॥२॥ इतो नृसिंहो परतोनृसिंहो, यतो-यतो यामिततो नृसिंह।  बर्हिनृसिंहो ह्र्दये नृसिंहो, नृसिंह मादि शरणं प्रपधे ॥३॥ तव करकमलवरे नखम् अद् भुत श्रृग्ङं। दलित हिरण्यकशिपुतनुभृग्ङंम्। केशव धृत नरहरिरुप, जय जगदीश हरे ॥४॥ वागीशायस्य बदने लर्क्ष्मीयस्य च बक्षसि।  यस्यास्ते ह्र्देय संविततं नृसिंहमहं भजे ॥५॥ श्री नृसिंह जय नृसिंह जय जय नृसिंह।  प्रहलादेश जय पदमामुख पदम भृग्ह्र्म ॥६॥ #अघोर #अवधूत #आर्यवर्त # श्री_नृसिंह_स्तवः गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय

नृसिंह मंत्र

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नृसिंह बीज मंत्र 〰〰〰〰〰〰 ॐ नृम नृम नृम नरसिंहाय नमः । नृसिंहं गायत्री 〰〰〰〰〰〰〰 ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्ण दंष्ट्राय धीमहि तन्नो नरसिंह प्रचोदयात ||  उग्रं वीरं  नृसिंह मंत्र   〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् । नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥ हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, तुम्हारी ज्वाला एवं  ताप चतुर्दिक फैली हुई है. हे नरसिंहदेव, तुम्हारा चेहरा सर्वव्यापी है, तुम मृत्यु के भी यम हो और मैं तुम्हारे  समक्षा आत्मसमर्पण करता हूँ । #अघोर #अवधूत #आर्यवर्त # नृसिंह_बीज_मंत्र #नृसिंह_गायत्री # उग्रं_वीरं_ नृसिंह_मंत्र  

।।श्री लक्ष्मी नृसिंह सर्वसिद्धिकर ऋणमोचन स्तोत्र।।

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।।श्री लक्ष्मी नृसिंह सर्वसिद्धिकर ऋणमोचन स्तोत्र।। 〰〰〰〰〰⚛⚛⚛〰⚛⚛⚛⚛〰⚛⚛⚛〰〰〰〰〰 देवकार्य सिध्यर्थं सभस्तंभं समुद् भवम। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।1।। लक्ष्म्यालिन्गितं वामांगं, भक्ताम्ना वरदायकं। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।2।। अन्त्रांलादरं शंखं, गदाचक्रयुध धरम्। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।3।। स्मरणात् सर्व पापघ्नं वरदं मनोवाञ्छितं। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।4।। सिहंनादेनाहतं, दारिद्र्यं बंद मोचनं। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।5।। प्रल्हाद वरदं श्रीशं, धनः कोषः परिपुर्तये। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।6।। क्रूरग्रह पीडा नाशं, कुरुते मंगलं शुभम्। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।7।। वेदवेदांगं यद्न्येशं, रुद्र ब्रम्हादि वंदितम्। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।8।। व्याधी दुखं परिहारं, समूल शत्रु निखं दनम्। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।9।। विद्या विजय दायकं, पुत्र पोत्रादि वर्धनम्। श्री नृसिंह महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ।।10।। भुक्ति मुक्ति प्रदायकं, सर्व सिद्धिकर नृणां। श्री नृसिंह महावीरं

लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्रम्

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लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्रम् 〰〰⚛⚛⚛⚛⚛〰〰 श्रीमत्पयोनिधिनिकेतन चक्रपाणे भोगीन्द्रभोगमणिरंजितपुण्यमूर्ते। योगीश शाश्वतशरण्यभवाब्धिपोतलक्ष्मीनृसिंहममदेहिकरावलम्बम॥1॥ ब्रम्हेन्द्र-रुद्र-मरुदर्क-किरीट-कोटि-संघट्टितांघ्रि-कमलामलकान्तिकान्त। लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्॥2॥ संसारघोरगहने चरतो मुरारे मारोग्र-भीकर-मृगप्रवरार्दितस्य। आर्तस्य मत्सर-निदाघ-निपीडितस्यलक्ष्मीनृसिंहममदेहिकरावलम्बम्॥3॥ संसारकूप-मतिघोरमगाधमूलं सम्प्राप्य दुःखशत-सर्पसमाकुलस्य। दीनस्य देव कृपणापदमागतस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्॥4॥ संसार-सागर विशाल-करालकाल-नक्रग्रहग्रसन-निग्रह-विग्रहस्य। व्यग्रस्य रागदसनोर्मिनिपीडितस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहिकरावलम्बम्॥5॥ संसारवृक्ष-भवबीजमनन्तकर्म-शाखाशतं करणपत्रमनंगपुष्पम्। आरुह्य दुःखफलित पततो दयालो लक्ष्मीनृसिंहम देहिकरावलम्बम्॥6॥ संसारसर्पघनवक्त्र-भयोग्रतीव्र-दंष्ट्राकरालविषदग्ध-विनष्टमूर्ते। नागारिवाहन-सुधाब्धिनिवास-शौरे लक्ष्मीनृसिंहममदेहिकरावलम्बम्॥7॥ संसारदावदहनातुर-भीकरोरु-ज्वालावलीभिरतिदग्धतनुरुहस्य। त्वत्पादपद्म-सरसीशरणागतस्य लक्ष्मी

नारसिंहसरस्वतीय-अष्टकं

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नारसिंहसरस्वतीय-अष्टकं 〰〰⚛⚛〰⚛〰⚛⚛〰〰 इंदुकोटितेज-करुणासिंधु-भक्तवत्सलम् । नंदनात्रिसूनुदत्त, इंदिराक्ष-श्रीगुरुम् । गंधमाल्यअक्षतादिवृंददेववंदितम् । वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम् ॥१॥ मोहपाशअंधकारछायदूरभास्करम् । आयताक्ष, पाहि श्रियावल्लभेशनायकम् । सेव्यभक्तवृंदवरद, भूयो भूयो नमाम्यहम् । वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम् ॥२॥ चित्तजादिवर्गषट्कमत्तवारणांकुशम् । तत्त्वसारशोभितात्मदत्त-श्रियावल्लभम् । उत्तमावतार-भूतकर्तृ-भक्तवत्सलम् । वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम् ॥३॥ व्योमवायुतेज-आपभूमिकर्तृमीश्वरम् । कामक्रोधमोहरहितसोमसूर्यलोचनम् । कामितार्थदातृभक्तकामधेनु-श्रीगुरुम् । वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम् ॥४॥ पुंडरीक-आयताक्ष, कुंडलेंदुतेजसम् । चंडुदुरितखंडनार्थ – दंडधारि-श्रीगुरुम् । मंडलीकमौलि-मार्तंडभासिताननं । वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम् ॥५॥ वेदशास्त्रस्तुत्यपाद, आदिमूर्तिश्रीगुरुम् । नादबिंदुकलातीत-कल्पपादसेव्ययम् । सेव्यभक्तवृंदवरद, भूयो भूयो नमाम्यहम् । वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम् ॥६॥ अष्टयोगतत्त्वनिष्ठ, तुष्टज्ञानवारिधिम । कृष्णावेणितीरवास

आत्म-देह रक्षार्थ श्री नरसिंह मंत्र

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आत्म-देह रक्षार्थ श्री नरसिंह मंत्र 〰〰〰⚛⚛〰⚛⚛⚛〰⚛⚛〰〰〰 ॐ नमो महा नरसिंहाय -सिंहाय सिंह-मुखाय विकटाय वज्रदन्त-नखाय माम् रक्ष -रक्ष मम शरीरं नख-शिखा पर्यन्तं रक्ष रक्षां कुरु-कुरु मदीय शरीरं वज्रांगम कुरु-कुरु पर -यन्त्र, पर-मंत्र, पर-तंत्राणां क्षिणु – क्षिणु खड्गादि-धनु -बाण-अग्नि-भुशंडी आदि शस्त्राणां इंद्र-वज्रादि ब्र्ह्मस्त्राणां स्तम्भय -स्तम्भय ,, जलाग्नि-मध्ये रक्ष ,, गृह -मध्ये ,, ग्राम-मध्ये ,,नगर-मध्ये ,, नगर-मध्ये ,, वन-मध्ये ,,रण-मध्ये ,, श्मशान-मध्ये रक्ष-रक्ष ,, राज-द्वारे राज-सभा मध्ये रक्ष रक्षां कुरु-कुरु ,, भूत-प्रेत -पिशाच -देव-दानव-यक्ष-किन्नर-राक्षस , ब्रह्म-राक्षस ,, डाकिनी-शाकिनी-मौन्जियादि अविधं प्रेतानां भस्मं कुरु-कुरु भो: अत्र्यम- गिरो सिंही -सिंहमुखी ज्वलज्ज्वाला जिव्हे कराल -वदने मां रक्ष-रक्ष ,, मम शरीरं वज्रमय कुरु-कुरु दश -दिशां बंध-बंध वज्र-कोटं कुरु-कुरु आत्म-चक्रं भ्रमावर्त सर्वत्रं रक्ष रक्ष सर्वभयं नाशय -नाशय ,, व्याघ्र -सर्प-वराह-चौरदिन बन्धय-बन्धय,, पिशाच-श्वान दूतान्कीलय-कीलय हुम् हुम् फट !! #अघोर #अवधूत #आर्यवर्त # आत्म_देह_रक्षार्थ_श्री_नरसिंह म

मृत्य्वष्टकम्

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मृत्य्वष्टकम् 〰〰〰〰〰〰 ।। मार्कण्डेय उवाच ।। नारायणं सहस्राक्षं पद्मनाभं पुरातनम् । प्रणतोऽस्मि हृषीकेशं किं मे मृत्युः करिष्यति ? ।। १ गोविन्दं पुण्डरीकाक्षमनन्तमजमव्ययम् । केशवं च प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ? ।। २ वासुदेवं जगद्योनिं भानुवर्णमतीन्द्रियम् । दामोदरं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ? ।। ३ शङ्खचक्रधरं देवं छन्नरुपिणमव्ययम् (छन्दोरुपिणमव्ययम्) । अधोक्षजं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ? ।। ४ वाराहं वामनं विष्णुं नरसिंहं जनार्दनम् । माधवं च प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ? ।। ५ पुरुषं पुष्करं पुण्यं क्षेमबीजं जगत्पतिम् । लोकनाथं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ? ।। ६ भूतात्मानं महात्मानं जगद्योनिमयोनिजम् (यज्ञयोनिमयोनिजम्) । विश्वरुपं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ? ।। ७ सहस्रशीर्षसं देवं व्यक्ताऽव्यक्तं सनातनम् । महायोगं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ? ।। ८ ।।फल-श्रुति।। इत्युदीरितमाकर्ण्य स्तोत्रं तस्य महात्मनः । अपयातस्ततो मृत्युर्विष्णुदूतैश्च पीडितः ।। ९ इत्येन विजितो मृत्युर्मार्कण्डेयेन धीमता ।

नृसिंह कवच ( ब्रह्म सावित्री संवादे नृसिंह पुराण अर्न्तगत)

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नृसिंह कवच ( ब्रह्म सावित्री संवादे नृसिंह पुराण अर्न्तगत) 〰〰〰〰〰〰〰〰⚛⚛〰〰〰〰〰〰〰〰 ॐ नमोनृसिंहाय सर्व दुष्ट विनाशनाय सर्वंजन मोहनाय सर्वराज्यवश्यं कुरु कुरु स्वाहा !  ॐ नमो नृसिंहाय नृसिंहराजाय नरकेशाय नमो नमस्ते !  ॐ नमः कालाय काल द्रष्टाय कराल वदनाय च !!  ॐ उग्राय उग्र वीराय उग्र विकटाय उग्र वज्राय वज्र देहिने रुद्राय रुद्र घोराय भद्राय भद्रकारिणे  ॐ ज्रीं ह्रीं नृसिंहाय नमः स्वाहा !!  ॐ नमो नृसिंहाय कपिलाय कपिल जटाय अमोघवाचाय सत्यं सत्यं व्रतं महोग्र प्रचण्ड रुपाय !  ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ॐ ह्रुं ह्रु ह्रु ॐ क्ष्रां क्ष्रीं क्ष्रौं फट् स्वाहा !  ॐ नमो नृसिंहाय कपिल जटाय ममः सर्व रोगान् बन्ध बन्ध, सर्व ग्रहान बन्ध बन्ध, सर्व दोषादीनां बन्ध बन्ध, सर्व वृश्चिकादिनां विषं बन्ध बन्ध, सर्व भूत प्रेत, पिशाच, डाकिनी शाकिनी, यंत्र मंत्रादीन् बन्ध बन्ध, कीलय कीलय चूर्णय चूर्णय, मर्दय मर्दय, ऐं ऐं एहि एहि, मम येये विरोधिन्स्तान् सर्वान् सर्वतो हन हन, दह दह, मथ मथ, पच पच, चक्रेण, गदा, वज्रेण भष्मी कुरु कुरु स्वाहा !  ॐ क्लीं श्रीं ह्रीं ह्रीं क्ष्रीं क्ष्रीं क्ष्रौं नृसिंहाय नमः स्वाहा !! 

श्री उग्र नृसिंह स्तुति

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श्री उग्र नृसिंह स्तुति 〰〰〰〰⚛⚛〰〰〰〰 व्याधूतकेसरसटाविकरालवक्त्रं हस्ताग्रविस्फुरितशङ्खगदासिचक्रम् | आविष्कृतं सपदि येन नृसिंहरूपं नारायणं तमपि विश्वसृजं नमामि || चञ्चच्चण्डनखाग्रभेदविहलद्दैत्येन्द्रवक्षः क्षर- द्रक्ताभ्यक्तसुपाटलोद्भटसदासंभ्रान्तभीमाननः | तिर्यक्कण्ठकठोरघोषघटनासर्वाङ्गखर्वीभव- द्दिङ्मातङ्गनिरीक्षितो विजयते वैकुण्ठकण्ठीरवः || दैत्यानामधिपे नखाङ्कुरकुटीकोणप्रविष्टात्मनि स्फारीभूतकरालकेसरसटासङ्घातघोराकृतेः | सक्रोधं च सविस्मयं च सगुरुव्रीडं च सान्तः स्मितं क्रीडाकेसरिणो हरेर्विजयते तत्कालमालोकितम् || सुरासुरशिरोरत्नकान्तिविच्छुरिताङ्घ्रये | नमस्त्रिभुवनेशाय हरये सिंहरूपिणे ||  #अघोर #अवधूत #आर्यवर्त #श्री_उग्र_नृसिंह_स्तुति

नरसिंह स्तुति

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नरसिंह स्तुति 〰〰〰〰〰〰〰 उदयरवि सहस्रद्योतितं रूक्षवीक्षं प्रळय जलधिनादं कल्पकृद्वह्नि वक्त्रम् | सुरपतिरिपु वक्षश्छेद रक्तोक्षिताङ्गं प्रणतभयहरं तं नारसिंहं नमामि || प्रळयरवि कराळाकार रुक्चक्रवालं विरळय दुरुरोची रोचिताशांतराल | प्रतिभयतम कोपात्त्युत्कटोच्चाट्टहासिन् दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ||१|| सरस रभसपादा पातभाराभिराव प्रचकितचल सप्तद्वन्द्व लोकस्तुतस्त्त्वम् | रिपुरुधिर निषेकेणैव शोणाङ्घ्रिशालिन् दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ||२|| तव घनघनघोषो घोरमाघ्राय जङ्घा परिघ मलघु मूरु व्याजतेजो गिरिञ्च | घनविघटतमागाद्दैत्य जङ्घालसङ्घो दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ||३|| कटकि कटकराजद्धाट्ट काग्र्यस्थलाभा प्रकट पट तटित्ते सत्कटिस्थातिपट्वी | कटुक कटुक दुष्टाटोप दृष्टिप्रमुष्टौ दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ||४|| प्रखर नखर वज्रोत्खात रोक्षारिवक्षः शिखरि शिखर रक्त्यराक्तसंदोह देह | सुवलिभ शुभ कुक्षे भद्र गंभीरनाभे दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ||५|| स्फुरयति तव साक्षात्सैव नक्षत्रमाला क्षपित दितिज वक्षो व्याप्तनक्षत्रमागर्म् | अरिदरधर जान्वासक्त हस्तद्वयाहो दह दह नरसिंहासह्यवीर्

श्री बटुक दिलाएंगे शनि राहु केतु के कष्ट से मुक्ति

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श्री बटुक दिलाएंगे शनि राहु केतु के कष्ट से मुक्ति 〰〰〰〰〰〰〰⚛⚛⚛〰〰〰〰〰〰〰〰 मित्रों, भगवान बटुक भैरव का प्राकट्य ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को हुआ था, उदय तिथि मत से इनका पूजन कल भी किया जा सकता है किंतु क्योंकि भैरव पूजन रात्रिकाल में ही श्रेयस्कर है अतः मेरी समझ से आज दशमी तिथि की रात्रि ही पूजन अधिक उत्तम होगा। बटुक #भैरव मूल मन्त्र:- 〰〰〰〰〰〰〰〰 ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ। बटुक भैरव #शाबर_मंत्र सिद्धि प्रयोग:- 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 निम्न मंत्र की 21 माला जप करें आसन, वस्त्र :- लाल दिशा: पूर्व, उत्तर माला : रुद्राक्ष ॐ ह्रीं बटुक भैरव बालक केश,भगवान वेश,सब आपदा को काल भक्त जनहट को पाल, कर धरे शिरकपाल दूजे करवाल त्रिशक्ति देवी को बाल भक्तजन मानस को भाल तेंतीस कोटि मन्त्र को जाल प्रत्यक्ष बटुक भैरव जानिए मेरी भक्ति गुरु की शक्ति । फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा। उपरोक्त मन्त्र सिद्ध होने पर एक माला मन्त्र का शुद्ध घी में बाजार में मिलने वाली हवन सामग्री में जैसे अक्षत,भीमसेनी कपूर, नाग केसर,काली तिल, कमल गट्टा इंद्र जव, जौ, शक्कर ,शहद, भोजपत्र ,पंच मेवा ,इलायची

||राम द्वादशनामस्तोत्र||

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||राम द्वादशनामस्तोत्र|| 〰⚛〰⚛〰⚛〰 प्रथमं श्रीधरं विद्याद्वितीयं रघुनायकम्। तृतीयं रामचंद्रं च चतुर्थं रावणान्तकम्।। पंचमं लोकपूज्यं च षष्ठमं जानकी पतिम्। सप्तमं वासुदेवं च श्रीरामं चाष्टमं तथा।। नवमं जलदश्यामं दशमं लक्ष्मणाग्रजम्। एकादशंच गोविंदं द्वादश सेतुबंधनम्।। द्वादशैतानि नामानि यःपठेत् श्रध्दयान्वितः। अर्धरात्रे तु द्वादश्यां कुष्ठदारिद्रयनाशनम्।। अरण्यै चैव संग्रामे अग्नौभयनिवारणम्। ब्रह्महत्या सुरापानं गोहत्या$$दि निवारणम्।। सप्तवारं पठेन्नित्यं सर्वारिष्टनिवारणम्। ग्रहणे च जले स्थित्वा नदीतीरे विशेषतः। अश्वमेधशतं पुण्यं ब्रह्मलोकं गमिष्यती।। ।। इति श्री स्कंदपुराणे उत्तरखंडे श्री उमामहेश्वर संवादे श्री रामद्वादशनाम स्तोत्र संपूर्णम्।। ।।जय जय श्री राम।। #अवधूत #अघोर #आर्यवर्त #राम_द्वादशनामस्तोत्र

ये कामवासना क्या है???

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ये काम,वासना क्या है ? 〰〰〰⚛⚛⚛〰〰〰 काम शब्द हमारे शरीर का वो हिस्सा है जो हमें जीने के लिए ऊर्जा और जन्म उत्पत्ति के लिए वासना देता है.काम शब्द शुक्र गृह से संचालित होता है काम शब्द में अथाह प्यार,क्रोध,झूठ, छल,कपट,क्रूरता और आनंद छिपा है, काम शब्द न होता तो स्त्री पुरुष का कभी प्यार ही न होता और न ही जीवन की उत्पत्ति होती . काम जीवन का आधार है. जो जितना महान आदमी होता है वो उतना ही कामी होता है .हम सब काम वासना के लिए जीते है और काम वासना के लिए कार्य करते है हम बहुत पढ़ते है बहुत धन कमाते है सुंदर शरीर बनाते है अच्छे कपडे पहने है ये सब सुंदर स्त्री प्राप्ति के लिए और वही स्त्री भी करती है एक पुरुष की प्राप्ति के लिए. काम शब्द स्त्री पुरुष के बीच एक चुम्बक है जो आपस में बाँध कर रखता है .अगर ये शब्द न होता तो स्त्री पुरुष का मिलन कभी न होता और न कभी प्यार होता है और न हम इस दुनिआ में जन्म लेते . प्यार का वाहन ही काम है प्यार जब होता है तो उसके पीछे काम वासना ही कार्य करती है पर काम छिपा होता है वो चुप रहता है ,जब प्यार अपने चरम सीमा पर होता है तो काम प्रकट हो जाता है. ये काम शब्द संतो क

अपराजिता साधना कैशे करे??

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क्या आप को पता है देवी अपराजिता साधना की साधना कैसे करे !! अपराजिता का अर्थ है जो कभी पराजित नहीं होता।देवी अपराजिता के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य भी जानने योग्य हैं जैसे कि उनकी मूल प्रकृति क्या है ?देवी अपराजिता के पूजनारम्भ तब से हुआ जब देवासुर संग्राम के दौरान नवदुर्गाओं ने जब दानवों के संपूर्ण वंश का नाश कर दिया तब माँ दुर्गा अपनी मूल पीठ शक्तियों में से अपनी आदि शक्ति अपराजिता को पूजने के लिए शमी की घास लेकर हिमालय में अन्तरध्यान हुईं। क्रमशः बाद में आर्यावर्त के राजाओं ने विजय पर्व के रूप में विजय दशमी की स्थापना की। जो कि नवरात्रों के बाद प्रचलन में आई। स्मरण रहे कि उस वक्त की विजय दशमी मूलतः देवताओं द्वारा दानवों पर विजय प्राप्त के उपलक्ष्य में थी। स्वभाविक रूप से नवरात्र के दशवें दिन ही विजय दशमी मनाने की परंपरा चली। इसके पश्चात पुनः जब त्रेता युग में रावण के अत्याचारों से पृथ्वी एवं देव-दानव सभी त्रस्त हुए तो पुनः पुरुषोत्तम राम द्वारा दशहरे के दिन रावण का अंत किया गया जो एक बार पुनः विजयादशमी के रूप सामने आया और इसके साथ ही एक सोपान और जुड़ गया दशमी के साथ।अगर यह कहा

।। अपराजिता - स्तोत्र ।।

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॥ अपराजिता-स्तोत्र ॥ 〰〰〰〰〰〰〰〰 -अपराजिता का अर्थ जो कभी पराजित नहीं होता | अपराजिता स्तोत्र का उपयोग अपने दैनिक जीवन में कर सकते हैं, आप इसका लाभ स्वयं ही देख सकते है यह है "अपराजिता स्तोत्र" अपराजिता का अर्थ है जो कभी पराजित नहीं होता | यह एक देवी है जिसे अपराजिता के नाम से जाना जाता है य......ह देवी दस महा विद्याओं में से एक है, और ये देवी जैसे की कभी खुद पराजित नहीं होती ठीक वेसे ही अपने भक्त की भी हार नहीं होने देती है तो लीजिये : अपराजिता स्तोत्र :- "अथ अपराजिता स्तोत्रं प्रारभ्यते" श्री गणेशाय नमः विनियोग :- ॐ अस्य श्री अपराजिता स्तोत्र महामंत्रस्य वेदव्यास ऋषि: अनुष्टुपच्छन्दः क्लीं बीजं हूँ शक्तिः सर्वाभीष्ट सिध्यर्थे जपे विनियोगः- मार्कंडेय उवाच :- शृणुध्वं मुनयः सर्वे सर्वकामार्थ सिद्धिदाम | असिद्ध साधनीं देवीं वैष्णवीमपराजिताम ।। ध्यानम :- नीलोत्पल-दल-श्यामां भुजंग भरणोज्वलाम, बालेन्दु-मौलीसदृशीं नयनत्रितयान्विताम । शंखचक्रधरां देवीं वरदां भयशालिनिं, पिनोतुंगस्तनीं साध्वीं बद्ध पद्मसनाम शिवाम । अजितां चिन्तयेद्देवीं वैष्णविमपराजिताम ।। शुद

श्री हनुमानजी की 12 नमो की प्रभावशाली विलक्षण स्तुति

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श्री हनुमान जी की 12 नामों की प्रभावशाली विलक्षण स्तुति श्री रामानुज श्री हनुमान जी की स्तुति जिसमें उनके बारह नामों का उल्लेख मिलता है। इन नामों के जप से भक्तों को सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। यदि हो सके तो श्री हनुमान स्तुति जोर-जोर से करनी चाहिए, ऐसा करने से वातावरण में अमंगलकारी तत्वों का नाश होता है।  दोहा :  उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान। बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥    स्तुति : -  हनुमान अंजनी सूत् र्वायु पुत्रो महाबलः। रामेष्टः फाल्गुनसखा पिङ्गाक्षोऽमित विक्रमः॥ उदधिक्रमणश्चैव सीता शोकविनाशनः। लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा॥   एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः। सायंकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत्॥ तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्। #अघोर #अवधूत #हनुमान #आर्यवर्त      

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र - अयि गिरिनंदिनि

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महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र - अयि गिरिनंदिनि अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते । भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥ सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥ अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते । मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥ अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते । निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥ अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते । दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते जय जय हे