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Showing posts from April, 2017

रामानुजचार्य

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राम-राम          श्री वैष्णव  समप्रदाय के श्रीराम भक्ति शाखा के आदि प्रवर्तक श्री रामानुजाचार्य जी महाराज की जयंती पर  आप सभी सनातनी भक्तजनो को हार्दिक बधाई एवं शुभकामना .... रामानुजाचार्य नाम                : रामानुजाचार्य । जन्म               :लक्ष्मण १०१७ ईसवी सन्।                        श्रीपेरम्बदूर, तमिल नाडु, भारत। मृत्यु                :११३७ ईसवी सन्।                        श्रीरंगम, तमिल नाडु, भारत। गुरु/शिक्षक      : यमुनाचार्य                         दर्शन विशिष्टाद्वैत। खिताब/सम्मान : श्रीवैष्णवतत्त्वशास्त्र के आचार्य साहित्यिक                                          कार्य वेदान्तसंग्रहम्, श्रीभाष्यम्,                               गीताभाष्यम्, वेदान्तदीपम्, वेदान्तसारम्,                         शरणागतिगद्यम्, श्रीरंगगद्यम्,                         श्रीवैकुण्ठगद्यम्, नित्यग्रन्थम्। रामानुजाचार्य (अंग्रेजी: Ramanuja जन्म: १०१७ - मृत्यु: ११३७) विशिष्टाद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक थे। वह ऐसे वैष्णव सन्त थे जिनका भक्ति परम्परा पर बहुत गहरा प्रभाव रहा। वैष्णव आचार

महादेव के 108 नामावली

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सोमवार को एक बार जपें भगवान शिव के ये 108 नाम, तुरंत दिखेगा असर भगवान शिव को भोले भंडारी कहा जाता है। अगर कोई उन्हें सच्चे मन से एक लोटा जल चढ़ा दें तो ही वो प्रसन्न होकर उसे सब कुछ दे डालते हैं। ज्योतिषी भी कुंडली में किसी ग्रह के अशुभ होने पर महादेव की ही आराधना करने की सलाह देते हैं। आइए आज बताते हैं आपको भोलेनाथ के 108 नामों के बारे में जिनका यदि सच्चे मन से सोमवार को जाप करते हुए भगवान शिव को जल चढ़ाया जाए तो कठिन से कठिन काम भी बन जाता है। भगवान शिव के 108 नाम   ॐ भोलेनाथ नमः ॐ कैलाश पति नमः ॐ भूतनाथ नमः ॐ नंदराज नमः ॐ नन्दी की सवारी नमः ॐ ज्योतिलिंग नमः ॐ महाकाल नमः ॐ रुद्रनाथ नमः ॐ भीमशंकर नमः ॐ नटराज नमः ॐ प्रलेयन्कार नमः ॐ चंद्रमोली नमः ॐ डमरूधारी नमः ॐ चंद्रधारी नमः ॐ मलिकार्जुन नमः ॐ भीमेश्वर नमः ॐ विषधारी नमः ॐ बम भोले नमः ॐ ओंकार स्वामी नमः ॐ ओंकारेश्वर नमः ॐ शंकर त्रिशूलधारी नमः ॐ विश्वनाथ नमः ॐ अनादिदेव नमः ॐ उमापति नमः ॐ गोरापति नमः ॐ गणपिता नमः ॐ भोले बाबा नमः ॐ शिवजी नमः ॐ शम्भु नमः ॐ नीलकंठ नमः ॐ महाकालेश्वर नमः ॐ त्रिपुरारी नमः ॐ

कर्म

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कर्म......!! कलयुग में आप जो कहते है, वेसा दिखने में लगता है, मगर कर्म का चक्र अटल है, जैशा करते है वैसा ही पाते है, बबुल का पौधा बोवोगे तो बड़ा होके कांटे ही मिलेंगे, आम नही। जीवन मे किये हुए सद्गुण का फल दर्शय रूप में कई अद्रश्य रूप में अवस्य ही मिलता है, सत्य की राह पे चलनेवाले को अपार कष्ट मिलता है, मगर आखिर में विजय उसीकी होती है, आपको एक सामान्य दुर्ष्टान्त देता हूं..... कोई भी इंसान कभी सुना है के पथ्थर को पूजे, मगर वही पथ्थर को कोई शिल्पकार आकार दे तो उसकी मन्दिर में पूजा होती है, वो भगवान होने के बावजूद भी शीनी हथोड़े की मार खानी पड़ती है, वो तो परमेश्वर है, विधाता है, हम तो आखिर तुच्छ मनुष्य है,इतना काफी है.... सच है कि हम जैसे कर्म करते है, हमें उसका वैसा ही फल मिलता है। हमारे द्वारा किये गए कर्म ही हमारे पाप और पुण्य तय करते है। हम अच्छे कर्म करते है तो हमें उसके अच्छे फल मिलते है और अगर हम बुरे कर्म करते है तो हमें उसके बुरे फल मिलते है। हमारे जीवन में जो भी परेशानियां आती हैं, उनका संबंध कहीं ना कहीं हमारे कर्मों से होता है। कबीरदास जी का ये दोहा हमें हमेशा ये एहसास दि

हनुमान चालीसा

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श्री हनुमान चालीसा (Shri Hanuman Chalisa in Hindi) ।।दोहा।। श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार | बरनौ रघुवर बिमल जसु , जो दायक फल चारि | बुद्धिहीन तनु जानि के , सुमिरौ पवन कुमार | बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार || ।।चौपाई।। जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिंहु लोक उजागर | रामदूत अतुलित बल धामा अंजनि पुत्र पवन सुत नामा ||2|| महाबीर बिक्रम बजरंगी कुमति निवार सुमति के संगी | कंचन बरन बिराज सुबेसा, कान्हन कुण्डल कुंचित केसा ||4| हाथ ब्रज औ ध्वजा विराजे कान्धे मूंज जनेऊ साजे | शंकर सुवन केसरी नन्दन तेज प्रताप महा जग बन्दन ||6| विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर | प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया रामलखन सीता मन बसिया ||8|| सूक्ष्म रूप धरि सियंहि दिखावा बिकट रूप धरि लंक जरावा | भीम रूप धरि असुर संहारे रामचन्द्र के काज सवारे ||10|| लाये सजीवन लखन जियाये श्री रघुबीर हरषि उर लाये | रघुपति कीन्हि बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरत सम भाई ||12|| सहस बदन तुम्हरो जस गावें अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावें | सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा ||14|| जम

परशुराम स्त्रोत्रम:

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ओम रां रां ओम रां रां ओम परशूहस्ताय नमः।। श्री परशुराम स्तोत्रम: कराभ्यां परशुं चापं दधानं रेणुकात्मजं! जामदग्न्यं भजे रामं भार्गवं क्षत्रियान्तकं!!१!! नमामि भार्गवं रामं रेणुका चित्तनन्दनं! मोचितंबार्तिमुत्पातनाशनं क्षत्रनाशनम्!!२!! भयार्तस्वजनत्राणतत्परं धर्मतत्परम्! गतगर्वप्रियं शूरं जमदग्निसुतं मतम्!!३!! वशीकृतमहादेवं दृप्त भूप कुलान्तकम्! तेजस्विनं कार्तवीर्यनाशनं भवनाशनम्!!४!! परशुं दक्षिणे हस्ते वामे च दधतं धनुः ! रम्यं भृगुकुलोत्तंसं घनश्यामं मनोहरम्!!५!! शुद्धं बुद्धं महाप्रज्ञापण्डितं रणपण्डितं! रामं श्रीदत्तकरुणाभाजनं विप्ररंजनम्!!६!! मार्गणाशोषिताभ्ध्यंशं पावनं चिरजीवनम्! य एतानि जपेन्द्रामनामानि स कृति भवेत्!!७!! #आर्यवर्त

भगवान परशुराम

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पौराणिक परिचय परशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत, भगवत पुराण और कल्किपुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। वे अहंकारी और धृष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से २१ बार संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे। उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था। वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु पक्षियों, वृक्षों, फल फूल औए समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे। उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है नाकि अपनी प्रजा से आज्ञापालन करवाना। वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे। उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है। यह भी ज्ञात है कि परशुराम ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ल

भगवान परशुराम की साधना के विशेष मन्त्र

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सर्वकामना सिद्धि हेतु जपें भगवान परशुराम के विशेष मंत्र  भगवान विष्णु के दशावतार में छठे अवतार भगवान परशुराम माने जाते हैं। क्रोध और दानशीलता में उनका कोई सानी नहीं है। शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता सिर्फ और सिर्फ भगवान परशुराम ही माने जाते हैं। भगवान शिव ने  ने उन्हें मृत्युलोक के कल्याणार्थ परशु अस्त्र प्रदा‍न किया जिससे वे परशुराम कहलाए। वे परम शिवभक्त थे।    उन्होंने सहस्रार्जुन की इहलीला समाप्त कर दी। प्रायश्चित के लिए सभी तीर्थों में तपस्या की। गणेशजी को एकदंत करने वाले भी परशुराम थे।  पृथ्वी को 17 बार क्षत्रियों से विहीन करने वाले भगवान परशुराम ही थे। उनकी दानशीलता ऐसी थी कि समस्त पृथ्‍वी ही ऋषि कश्यप को दान कर दी। उनके शिष्यत्व का लाभ दानवीर कर्ण ही ले पाए जिसे उन्होंने ब्रह्मास्त्र की दीक्षा ‍दी।   भगवान परशुराम की सेवा-साधना करने वाले भक्त भूमि, धन, ज्ञान, अभीष्ट सिद्धि, दारिद्रय से मुक्ति, शत्रु नाश, संतान प्राप्ति, विवाह, वर्षा, वाक् सिद्धि इत्यादि पाते हैं। महामारी से रक्षा कर सकते है। अक्षय तृतीया के दिन सर्वकामना की सिद्धि हेतु भगवान परशुराम के गायत्री मंत्र का जाप

रुद्राष्टकम

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श्री रुद्राष्टकम् (संस्कृत:श्री रुद्राष्टकम्) स्तोत्र महाज्ञानी लंकेश रावण या दशानन द्वारा भगवान् शिव की स्तुति हेतु रचित एवं प्रथम गायित है। इसका उल्लेख श्री रामचरितमानस के उत्तर कांड में आता है। यह जगती छंद में लिखा गया है | श्री रुद्राष्टकम् ।। 🐲🐲🐲🐲 शिव को समर्पित यह स्तोत्र तुलसीदास की रामचरितमानससे लिया गया है। ॥ अथ रुद्राष्टकम् ॥ नमामीशमीशान निर्वाणरूपम्। विभुम् व्यापकम् ब्रह्मवेदस्वरूपम्। निजम् निर्गुणम् निर्विकल्पम् निरीहम्। चिदाकाशमाकाशवासम् भजेऽहम् ॥१॥🚩🚩 निराकारमोङ्कारमूलम् तुरीयम्। गिराज्ञानगोतीतमीशम् गिरीशम्। करालम् महाकालकालम् कृपालम्। गुणागारसंसारपारम् नतोऽहम् ॥२॥🚩🚩 तुषाराद्रिसङ्काशगौरम् गभीरम्। मनोभूतकोटि प्रभाश्रीशरीरम्। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारुगङ्गा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥३॥🚩🚩 चलत्कुण्डलम् भ्रूसुनेत्रम् विशालम्। प्रसन्नाननम् नीलकण्ठम् दयालम्। मृगाधीश चर्माम्बरम् मुण्डमालम्। प्रियम् शङ्करम् सर्वनाथम् भजामि ॥४॥🚩🚩 प्रचण्डम् प्रकृष्टम् प्रगल्भम् परेशम्। अखण्डम् अजम् भानुकोटिप्रकाशम्। त्रयः शूलनिर्मूलनम् शूलपाणिम्। भजेऽहम् भवा

अघोर

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अघोरी और अघोर साधक:अघोर का अर्थ तो स्वयं महाकाल श्री अघोरेश्वर अलख पुरुष शिव शम्भो महारुद्र हैं । जिन्हेंश्मशान सबसे अधिक प्रिय है । जो सत्यता का सर्वोपरि उदहारण है । सत्य में निवास करते महादेव । मोह माया के घोर से घोर रूप में मनुष्य में समाहित फिर भी अघोर प्रेम होकर भी बंधन नहीं । सबसे मुक्त ।उन्ही के आचरण को समाहित करते साधक अघोर पंथ के साधक होते हैं । अघोर पंथ के मुख्य चरण होते हैंअनुयायी - साधक - औघड़ - अघोरी - परम हंस ।।।अनुयायी ऐसा साधक है जो वीर मार्गी साधना में अग्रसर हो अघोर को समझ कर भय मुक्त प्रेम करे । घृणा मुक्त कार्य करे । अघोरेश्वर महादेव में लीन होने का प्रयास करे । अक्सर जन्म जन्मान्तर के साधना क्रम को समाहित कर अघोर पंथ की ओर अग्रसर होता है । साधक के भाव लक्षणऔर झुकाव मार्ग को प्रशस्त करते हुए गुरु के समक्ष खड़ा कर देते हैं ।साधक के भाव को समझ जब गुरु उसे दीक्षा देते हैं । उसका पुनर्जन्म होता है । ज्ञान चक्षु खोल गुरु उसे संसार एवं संसार में ही उपस्थित दुसरे संसार को दिखाते हैं । साधना देते हैं। तब अनुयायी साधक के रूप में जन्म लेता है । गुरु द्वारा प्रदत्त साधनाओ को करत

रुद्राक्ष

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Rudraksh - Vedic Yog Rahasya (Part 3) ACTIVATION OF THE SACRAL CHAKRA : स्वाधिष्ठान चक्र Dear Rudransh Followers, In my previous article i talked about divine significance of Rudraksh beads in Yoga, also i talked about Kundalini Chakra activation , Activation Of Root Chakra with the help of perfect kundalini chakra specific Rudraksh beads.. In my series of 8 articles , i will lets you know one by one 7 kundalini chakras and Chakra specific Rudraksh Beads. This article will discuss the significance of the Second Kundalini Chakras & Chakra specific Rudraksh Beads. 1. The Sacral Chakra : स्वाधिष्ठान चक्र The deity associated with this chakra is the four-armed God Varuna. Varuna is the god of water in the underworld, personifying the power of the bodies liquid elements like Blood, Lymph, Semen, Urine and Saliva. This is why the Moon planet is such a powerful symbol with this Sacral Chakra, as it controls the moving ‘tides’ in our waters. In my last article we opened the Root

मनुवाद मनुस्मृति

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मनुवाद क्या है और क्यों विवाद है इसपर ? मनु कहते हैं- जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते। अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं। वर्तमान दौर में ‘मनुवाद’ शब्द को नकारात्मक अर्थों में लिया जा रहा है। ब्राह्मणवाद को भी मनुवाद के ही पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है। वास्तविकता में तो मनुवाद की रट लगाने वाले लोग मनु अथवा मनुस्मृति के बारे में जानते ही नहीं है या फिर अपने निहित स्वार्थों के लिए मनुवाद का राग अलापते रहते हैं। दरअसल, जिस जाति व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराया जाता है, उसमें जातिवाद का उल्लेख ही नही है । क्या है मनुवाद ? जब हम बार-बार मनुवाद शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में भी सवाल कौंधता है कि आखिर यह मनुवाद है क्या? महर्षि मनु मानव संविधान के प्रथम प्रवक्ता और आदि शासक माने जाते हैं। मनु की संतान होने के कारण ही मनुष्यों को मानव या मनुष्य कहा जाता है। अर्थात मनु की संतान ही मनुष्य है। सृष्टि के सभी प्राणियों में एकमात्र मनुष्य ही है जिसे विचारशक्ति प्राप्त है। मनु ने मनुस्मृ‍ति में समाज संचालन के ल

हिन्दू के दुश्मन

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#हिन्दुओं__के__50__दुश्मन – #जीवित__एवं__मुर्दा भारत में कार्यरत प्रसिद्ध पत्रकार François Gautier के आधिकारिक ब्लॉग पर ‘हिन्दुओं के 50 दुश्मन’ नामक शीर्षक के साथ 50 (लोगों, जगहों और कार्यस्थलों) की एक लिस्ट दी गई है, जिसके साथ लिखा गया है कि ये हिन्दुओं के वे 50 दुश्मन है जो या तो जीवित हैं या मर चुके हैं। 1) Thomas Babington Macaulay ( मैकाले ) – भारत में अंग्रेजी शिक्षा की नींव रखने वाले। 2) Indian National Congress ( कांग्रेस पार्टी ) – भारत की सबसे पुरानी पार्टी जिसकी नींव ऐ ओ ह्युम नामक ब्रिटिश ने रखी थी। 3) Jawaharlal Nehru ( जवाहर लाल नेहरु ) – भारत के पहले प्रधानमन्त्री 4) Babur ( बाबर ) – मुगल शासक 5) Sonia Gandhi ( सोनिया गाँधी ) – कांग्रेसी नेता 6) The Pope ( पोप ) – प्रमुख इसाई धर्म गुरु 7) Rahul Gandhi ( राहुल गांधी ) – कांग्रेसी नेता 8) The Communist Party of India ( सीपीआई ) – कम्युनिस्ट पार्टी 9) Priyanka Gandhi ( प्रियंका गाँधी ) – कांग्रेसी नेता 10) Barkha Dutt ( बरखा दत्त ) – पत्रकार 11) Kancha Ilaiah ( कांचा इलैः ) – अमेरिकन लेखक 12) Aamir Khan ( आमिर